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कोविड आपातकाल

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एक लड़की रो रही है। उसकी मां मर रही है, मर गई है, वहीं अस्पताल के सामने। एक मंत्री एक मरीज को आॅक्सीजन देने के लिए गिड़गिड़ाते बेटे को तमाचा लगाने को कहता है। बेटा कहता है मार दीजिए तमाचा, लेकिन इलाज तो करा दीजिए मेरी मां मर जाएगी!

republic tv, arnay goswami, corona, covid-19, oxygen shortageअस्पताल में नहीं बैड, एंबुलेंस में इंतजार करते कोरोना मरीजा (फोटोः ट्विटर@BanglarGorboMB)

शहर-शहर कोरोना का कहर! सांस सांस पर सांसत!


– आॅक्सीजन पर राजनीति! हिंदुस्तान का दम घुट रहा है!


– देश पहले कि राजनीति! यह कोविड आपातकाल है!


– कोरोना काल में आंदोलन क्यों? चुनाव रैली क्यों?


एक किसान नेता- ‘कोरोना हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकता, अगर कोरोना हुआ तो जिम्मेदारी सरकार की!’


– तीन लाख से ऊपर केस आए, ये पांच लाख तक जा सकते हैं।


– ‘पीक’ या चरम पर कब जाएगी, कब उतरेगा कोरोना का कहर?


– एक विशेषज्ञ- ‘पंद्रह मई तक आ सकती है पीक, फिर शुरू होगा उतार!’


– एक विशेषज्ञ चेताता है- ‘अभी तीसरी लहर भी आनी है।’


किसी तरह राहत नहीं। किसी खबर से राहत नहीं। किसी चर्चा से राहत नहीं। कोई नहीं सोचता कि आदमी खबरों में समाए डर से ही मर जाएगा।


एक दिन प्रधानमंत्री की टीका बनाने वालों के साथ बैठक। टीका उत्पादन और संग्रह में बढ़ोतरी की योजना। फिर घोषणा कि अठारह साल और उससे ऊपर वालों को एक मई से टीका। राज्यों की जिम्मेदारी, लेकिन टीके के दाम पर फिर खिच-खिच।


विपक्ष का एक नेता- ‘सबको मुफ्त में लगाए केंद्र।’ दूसरा नेता- ‘सबको मुफ्त में क्यों नहीं? इसे कहते हैं माल-ए-मुफ्त दिल-ए-बेरहम!’


अगले रोज आॅक्सीजन का संकट- इस अस्पताल में दो घंटे की बची है… इसमें तीन घंटे की बची है… इसमें चार की बची है। अगर आॅक्सीजन सही समय पर न पहुंची तो मरीजों का क्या होगा? खबरों में खतरा मंडराता है।


महाराष्ट्र में कमी। दिल्ली में कमी, इधर कमी, उधर कमी।


आॅक्सीजन का एक टैंकर फट जाता है और वेंटीलेटर पर निर्भर चौबीस मरीज खत्म! एक अन्य अस्पताल में आग और तेरह मरीज खत्म। अब करते रहिए जांच।


दिल्ली कहती है कि यूपी हरियाणा ने आॅक्सीजन रोकी। वे कहते हैं कि धरने पर बैठे किसानों ने रोकी। फिर होने लगी तू-तू मैं-मैं, यानी जिसे मरना है मरे, हमारी बला से।


मौत सामने नाचती हुई दिखती है। इस अस्पताल के सामने दम तोड़ते मरीज। उस एंबुलेंस में दम तोडता मरीज। ऐन केमरे के सामने धीरे-धीरे रुकती सांसें। मुंह में आता झाग और फिर परिजनों का रोना-बिलखना। कोई सीना दबा कर सांस लौटाने की कोशिश कर रहा है और रोता जा रहा है।


यूपी का एक अस्पताल। अस्पताल तीमारदार से कहता है कि अपनी आॅक्सीजन खुद लाओ, वह कहता है कि कहां से लाएं। कहीं है ही नहीं। उसका पिता मर रहा है और कोई कुछ नहीं कर रहा है। इस कदर अनाथ जन कब दिखे? कहां हैं वे नेता जो विज्ञापनों में प्रदेश को स्वर्ग बनाने का दावा करते हर दस मिनट में दिखते हैं!


रेमडेसिविर की कालाबाजारी। आॅक्सीजन की कालाबाजारी। टीके की चोरी और कालाबाजारी। आॅक्सीजन से भरा एक पूरा ट्रक अचानक गायब।


एक अस्पताल का चीफ एक चैनल पर- ‘हमारे अस्पताल की आॅक्सीजन खत्म। मरीजों को वापस भेजना पड रहा है। आॅक्सीजन न आई तो इन कोविड मरीजों का क्या होगा?’ बोलते-बोलते उसका गला भर आता है।


एक बहस में एक चर्चक बार-बार पूछता है कि ये सरकारें हमने किसलिए चुनी हैं? जब ये नेता कुछ कर नहीं सकते तो वोट लेने क्यों आते हैं?


एक अंग्रेजी एंकर तल्खी से बताता है कि बारह अदालतों ने सरकारों को फटकार लगाई है कि तैयारी क्यों नहीं की? एक अदालत ने केंद्र को फटकार लगाई है कि चाहे रोओ-गिड़गिड़ाओ, लेकिन आॅक्सीजन का इंतजाम तुरंत करो। आॅक्सीजन का कोटा तुरंत बढा दिया जाता है।


एक लड़की रो रही है। उसकी मां मर रही है, मर गई है, वहीं अस्पताल के सामने। एक मंत्री एक मरीज को आॅक्सीजन देने के लिए गिड़गिड़ाते बेटे को तमाचा लगाने को कहता है। बेटा कहता है मार दीजिए तमाचा, लेकिन इलाज तो करा दीजिए मेरी मां मर जाएगी!


बड़ी अदालत ने केंद्र सरकार को कस के फटकारा है। सरकार कर क्या रही है? यह कोविड आपातकाल है। एक डॉक्टर कहता है- ‘ये ‘कल्पेबल होमीसाइड’ है।‘आॅक्सीजन की किल्लत से जूझ रहे दिल्ली के मैक्स और गंगाराम अस्पताल को भी दो घंटे की आॅक्सीजन पहुंचाई गई है।


चलते चलते- शुक्रवार की सुबह पीएम-सीएमों की बैठक जारी है। दिल्ली के सीएम ने दिल्ली की जनता को बचाने के लिए जरूरी आॅक्सीजन की बेरोक आपूर्ति की व्यवस्था करने और कोविड से लडने के लिए ‘राष्ट्रीय प्लान’ बनाने की मांग की है!

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