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कोरोना से बच्चों को कितना ख़तरा? AIIMS की स्टडी में सामने आई यह अहम बात

एम्स में पल्मोनोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ अनंत मोहन ने कहा कि हमने किशोरों के क्लिनिकल प्रोफाइल को सामने लाने का प्रयास किया है, यह संभवत: भारत की ओर से इस तरह का पहला डेटा सेट है।

अनोंना दत्त.

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के डॉक्टरों द्वारा की गई स्टडी में पता चला है कि कोरोना महामारी की पहली और दूसरी लहर के दौरान वयस्कों की तुलना में किशोरों में हल्के लक्षण और कम मृत्य दर देखने को मिले। एम्स के डॉक्टरों ने यह अध्ययन कोरोना महामारी से पीड़ित 197 रोगियों पर की। जो 12 से 18 वर्ष की आयु के थे और जिन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था ।

15 से 17 वर्ष की आयु के बच्चों के 3 जनवरी से टीकाकरण शुरू होने के कारण डॉक्टर अस्पताल में भर्ती इन रोगियों के क्लिनिकल ​​प्रोफाइल का अध्ययन करना चाहते थे। विश्लेषण से पता है कि 84.6% किशोरों में हल्की बीमारी, 9.1% में मध्यम बीमारी और 6.3% में गंभीर बीमारी के लक्षण दिखाई दिए। इन लोगों में बुखार और खांसी सबसे आम लक्षण थे जिनमें से 14.9% ने इसका अनुभव किया। विश्लेषण के अनुसार, 11.5% बच्चों के शरीर में दर्द था, 10.4% बच्चे थके हुए महसूस कर रहे थे और 6.2% बच्चों को सांस लेने में तकलीफ आई।

इसकी तुलना में उसी अस्पताल के एक अन्य अध्ययन के अनुसार दूसरी लहर के दौरान करीब 50.7% वयस्क को सांस लेने में तकलीफ का सामना करना पड़ा। विश्लेषण के अनुसार सिर्फ 7.3% बच्चों को ऑक्सीजन की आवश्यकता पड़ी, 2.8% को उच्च प्रवाह वाले ऑक्सीजन की आवश्यकता थी और 2.3% को वेंटिलेशन की आवश्यकता थी। जबकि सिर्फ 24.1% बच्चों को ही स्टेरॉयड और 16.9% बच्चों को रेमेडिसविर दी गई। अध्ययन में यह भी देखा गया कि इस आयु वर्ग में 3.1% मृत्यु दर दर्ज की गई जबकि दूसरी लहर के दौरान उसी अस्पताल में वयस्कों के मामले में 19.1% मृत्यु दर दर्ज की गई।

एम्स में पल्मोनोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ अनंत मोहन ने कहा कि हमने किशोरों के क्लिनिकल प्रोफाइल को सामने लाने का प्रयास किया है, यह संभवत: भारत की ओर से इस तरह का पहला डेटा सेट है। अब तक हम मुख्य रूप से वयस्कों में कोरोना के लक्षणों और उपचारों पर ध्यान केंद्रित कर रहे थे। जबकि हमने देखा कि दूसरी लहर के दौरान भर्ती हुए बच्चे काफी गंभीर थे। वयस्कों की तुलना में इस आयु वर्ग में मृत्यु दर कम है।

अध्ययन में यह भी पता चला कि कैंसर से पीड़ित बच्चों में इस बीमारी के ज्यादा विकसित होने की संभावना अधिक थी। साथ ही यह भी पता चला कि अस्थमा, मधुमेह जैसी बीमारी से पीड़ित बच्चों में यह जोखिम कम था। एम्स झज्जर की डॉक्टर डॉ सुषमा भटनागर ने कहा कि हमने देखा कि वयस्कों की तुलना में बच्चों में लक्षण हल्के थे। मौजूदा लहर के दौरान भी हमें शायद ही बच्चों के मामले मिल रहे हैं।

देश में सभी वयस्कों में से 94% को एक खुराक और 72% को टीकों की दोनों खुराक प्राप्त होने को लेकर डॉ अनंत मोहन ने कहा कि वैक्सीन अतिरिक्त सुरक्षा प्रदान करता है। जब एक सुरक्षित और प्रभावी टीका स्वीकृत हो जाएगा है तो बच्चों को भी अन्य आयु वर्ग की तरह ही टीके दिए जा सकते हैं।

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