POLITICS

कैसे मजबूत बने पंचायती व्यवस्था

पंचायती राज व्यवस्था आम लोगों की ताकत है। बीते तीन दशकों में पंचायतें बदली हैं। इन सबमें एक प्रमुख बात यह रही है कि महिलाओं की स्थानीय स्तर पर भागीदारी बढ़ी है। केंद्रीय और प्रादेशिक स्तर पर निर्वाचित सरकारों की मौजूदगी किसी लोकतंत्र के लिए काफी नहीं है।

सुशील कुमार सिंह

सुशासन शांति और खुशहाली का परिचायक होता है। पंचायत एक ऐसी संस्था है जो सुशासन को आगे बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। पंचायती राज व्यवस्था के रूप में लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण का संस्थानीकरण स्थानीय स्वशासन की दिशा में न केवल एक महत्त्वपूर्ण और ऐतिहासिक कदम है, बल्कि लघु गणतंत्र की दिशा में भी व्यापक दृष्टिकोण है। इतना ही नहीं, यह महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज की इच्छा का परिणाम भी है। गांव के विकास के बिना भारत की प्रगति संभव नहीं है, यह कथन कहीं अधिक पुराना है, मगर इसके नएपन से आज भी छुटकारा नहीं मिला है। जहां से शासन में सबकी भागीदारी सुनिश्चित होती हो और समस्याओं को समझने तथा हल करने का जमीनी प्रयास संभव हो, वही पंचायत है।

पंचायत शब्द भारत के लिए नया नहीं है। यह प्राचीन काल से ही अस्तित्व में रहा है। जब समावेशी ढांचा तैयार किया जाता है और उसके उद्देश्य तय किए जाते हैं और इन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए संस्था का खाका बनता है, तब पंचायत के मार्ग से ही गुजरना पड़ता है। पंचायत केवल एक शब्द भर नहीं है, बल्कि गांव की वह जीवनधारा है जहां से सर्वोदय की भावना और पंक्ति में खड़े अंतिम व्यक्ति को समान होने का एहसास होता है। पंचायत लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण का परिचायक है।

सामुदायिक विकास कार्यक्रम इसकी नींव है, जिसकी शुरुआत दो अक्तूबर, 1952 को हुई थी। पंचायत जैसी संस्था की बनावट कई प्रयोगों और अनुप्रयोगों का भी नतीजा है। सामुदायिक विकास कार्यक्रम का विफल होना, तत्पश्चात बलवंत राय मेहता समिति का गठन और 1957 में उसी की रिपोर्ट पर इसका मूर्त रूप लेना देखा जा सकता है। गौरतलब है कि जिस पंचायत को राजनीति से परे और नीति उन्मुख सजग प्रहरी की भूमिका में समस्याएं दूर करने का एक स्वरूप माना जाता है, आज वही कई समस्याओं में जकड़ी हुई है।

नीति निर्देशक तत्व के अनुच्छेद 40 के अंतर्गत पंचायत के गठन की जिम्मेदारी राज्यों को दी गई थी। लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण की दृष्टि से इसका अनुपालन सुनिश्चित करना न केवल इनका दायित्व था, बल्कि गांवों के देश भारत को सामाजिक-आर्थिक दृष्टि से अत्यंत शक्तिशाली भी बनाना था। इस मामले में पंचायतें कितनी सफल हैं, यह पड़ताल का विषय है। मगर लाख टके का सवाल यह है कि जिस पंचायत ने सबसे नीचे के लोकतंत्र को मजबूती दे रखी है, वही समस्याओं से मुक्त नहीं है।

चाहे वित्तीय संकट हो या उचित नियोजन की कमी या फिर अशिक्षा, रूढ़िवादिता तथा पुरुष वर्चस्व के साथ जात-पांत और ऊंच-नीच ही क्यों न हो। हालांकि पिछले तीन दशकों में ये समस्याएं कम भी हुई हैं और पंचायती व्यवस्था ने यह सिद्ध भी किया है कि उसका कोई विकल्प नहीं है।

पंचायत और सुशासन का गहरा रिश्ता है। पंचायत जहां लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण का परिचायक है और स्वायत्तता इसकी धरोहर है, वहीं सुशासन कहीं अधिक संवेदनशील लोक कल्याण और पारदर्शिता व खुलेपन से युक्त है। पंचायत की व्याख्या में क्षेत्र विशेष में शासन करने का पूर्ण और विशिष्ट अधिकार निहित है। इसी अधिकार से उन दायित्वों की पूर्ति भी होती है जो ग्रामीण प्रशासन के तहत स्वशासन का बहाव भरता है। जबकि सुशासन एक ऐसी अवधारणा है जो बार-बार शासन को यह सचेत करती है कि समावेशी और सतत विकास के साथ बारंबार सुविधा प्रदायक की भूमिका में बने रहना है।

1997 का ‘सिटिजन चार्टर’ सुशासन की ही देन थी और 2005 का सूचना का अधिकार इसी का एक और अध्याय था। इतना ही नहीं, 2006 की ई-शासन योजना से भी पंचायतों को ताकत मिली है। सुशासन की अवधारणा 1992 में सबसे पहले ब्रिटेन में आई थी। हालांकि 1991 के उदारीकरण के बाद इसकी पहल भारत में भी देखी जा सकती है। सुशासन के इसी वर्ष में पंचायती राज व्यवस्था को संवैधानिक स्वरूप दिया जा रहा था। संविधान के 73वें संशोधन में जब इसे संवैधानिक स्वरूप दिया गया, तब दो अक्तूबर 1959 से राजस्थान के नागौर से यात्रा कर रही यह पंचायत रूपी संस्था एक नए आभामंडल से युक्त हो गई।

1992 में हुए इस संशोधन को 24 अप्रैल 1993 को लागू किया गया। गौरतलब है कि संविधान के इसी संशोधन में गांधी के ग्रामीण स्वशासन को पूरा किया गया। पंचायतों में एक तिहाई महिलाओं का आरक्षण इसी संशोधन के साथ सुनिश्चित कर दिया गया था, जो मौजूदा समय में पचास फीसद तक है।

देखा जाए तो तीन दशक पुरानी संवैधानिक पंचायती राज व्यवस्था में व्यापक बदलाव तो आया है। राजनीतिक माहौल में सहभागी महिला प्रतिनिधियों के प्रति पुरुषों की सोच बदली है। बावजूद इसके विभिन्न आर्थिक-सामाजिक रुकावटों के कारण आंतरिक क्षमता और शक्ति को लेकर महिलाओं में भरोसा पूरी तरह बन गया हो, ऐसा कम ही दिखाई देता है। लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण की यही सजावट है कि पंचायतें सामाजिक प्रतिष्ठा और महिला भागीदारी से सबसे ज्यादा भरी हुई हैं, मगर राजनीतिक माहौल में अपराधीकरण, बाहुबल, जात-पांत और ऊंच-नीच आदि दुर्गुणों से पंचायतें भी मुक्त नहीं हैं।

समानता पर आधारित सामाजिक संरचना का गठन सुशासन की एक कड़ी है। इसलिए पंचायतों का उद्देश्य एक शोषण मुक्त समाज का निर्माण होना चाहिए, जहां सुशासन का प्रभाव हो, जिसमें पंचायत में पारदर्शिता और खुलेपन को बढ़ावा मिल सके, ताकि 11वीं अनुसूची में दर्ज 29 विषयों को जनहित में सुनिश्चित कर ग्रामीण प्रशासन को सशक्त किया जा सके।

गौरतलब है कि 2011 की जनगणना के अनुसार देश में हर चौथा व्यक्ति अभी भी अशिक्षित है और पंचायत व सुशासन पर इसका प्रभाव देखा जा सकता है। अधिकतर महिला प्रतिनिधि अनपढ़ हैं। इससे उनको पंचायत के लेखापत्र नियम पढ़ने व लिखने में कई दिक्कत आती हैं।

डिजिटल इंडिया का संदर्भ भी 2015 से देखा जा सकता है। आनलाइन क्रियाकलाप और डिजिटलीकरण ने भी पंचायत से जुड़े ऐसे प्रतिनिधियों के लिए चुनौती पैदा की है। हालांकि देश की लाखों पंचायतों को अभी डिजिटल तकनीक से जोड़ना बाकी है, साथ ही बिजली आदि की आपूर्ति का कमजोर होना भी इसमें एक बाधा है।

डिजिटल क्रांति ने सुशासन पर गहरी छाप छोड़ी है। जहां एक तरफ डिजिटल लेन-देन में तेजी आई है, कागजों के आदान-प्रदान में बढ़ोत्तरी हुई है, भूमि दस्तावेजों का डिजिटलीकरण हो रहा है, फसल बीमा कार्ड, मृदा स्वास्थ कार्ड और किसान क्रेडिट कार्ड सहित प्रधानमंत्री फसल बीमा जैसी योजनाओं में दावों के निपटारे के लिए रिमोट सेंसिंग, कृत्रिम मेधा आदि का प्रयोग होने लगा है, वहीं ग्राम पंचायतों में खुले स्वास्थ सेवा केंद्रों में ग्रामीण महिलाओं की भागीदारी को प्रोत्साहन भी दिया जा रहा है, ताकि वे ग्राम स्तरीय उद्यमी बने। सूचना और प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल करते हुए शासन की प्रक्रियाओं का पूर्ण रूपांतरण ही ई-गवर्नेंस कहलाता है, जिसका लक्ष्य आम नागरिकों को सभी सरकारी सेवाओं तक पहुंच प्रदान करते हुए साक्षरता, पारदर्शिता और विश्वसनीयता को सुनिश्चित करना है।

पंचायती राज व्यवस्था आम लोगों की ताकत है। बीते तीन दशकों में पंचायतें बदली हैं। इन सबमें एक प्रमुख बात यह रही है कि महिलाओं की स्थानीय स्तर पर भागीदारी बढ़ी है। केंद्रीय और प्रादेशिक स्तर पर निर्वाचित सरकारों की मौजूदगी किसी लोकतंत्र के लिए काफी नहीं है। सुशासन की दृष्टि से भी देखें तो लोक सशक्तिकरण इसकी पूर्णता है और लोक विकेंद्रीकरण की दृष्टि से देखें तो पंचायत में ये सभी खूबियां हैं। लोकतंत्र के लिए यह भी जरूरी है कि स्थानीय स्तर पर स्थानीय मसलों और समस्याओं के निराकरण के लिए एक निर्वाचित सरकार हो, जिसे स्थानीय मुद्दों पर स्वायत्तता प्राप्त हो।

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