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कहानी रेशमा की, जिसने जान पर खेलकर बजवाई हिरोइनों के लिए सीटियां

फिल्मी पर्दे पर आपने बड़े-बड़े सितारों को एक से एक खतरनाक स्टंट करते देखा होगा. ऊंची बिल्डिगों से कूदना, आग का दरिया पार करना, चलती गाड़ी से छलांग लगा देना जैसे स्टंट देख तालियां भी बजाई होंगी और सीटियां भी मारी होंगी. आप में से कई तो अपने चहेते सितारों के सिर्फ इसलिए मुरीद होंगे कि आपने उन्हें दिलेरी से स्टंट करते और जान पर खेलकर विलेन से लड़ते देखा होगा. लेकिन आपमें से बहुत कम लोग ये जानते होंगे कि जान हथेली पर रखकर किए जाने वाले ये ज्यादातर स्टंट आपका चहेता अभिनेता-अभिनेत्री नहीं बल्कि उनके वो डुप्लीकेट करते हैं, जिन्हें स्टंट मैन या स्टंट वुमन कहा जाता है. AAJTAK.IN लाया है कहानी बॉलीवुड की पहली स्टंट वुमन की. नाम है रेशमा पठान. रेशमा अब तक 800 से ज्यादा फिल्मों में बतौर स्टंट वुमन काम कर चुकी हैं. पांच भाई-बहनों में सबसे बड़ी रेशमा ने 1968 में बॉलीवुड में कदम रखा. उनकी आखिरी फिल्म 2017 में आई ‘गोलमाल अगेन’ थी. 68 की उम्र में भी रेशमा इंडस्ट्री में आंशिक रूप से सक्रिय हैं. हाल ही में उन्होंने ड्राईफ्रूट का ऐड किया था. उन्होंने इंडस्ट्री के ही स्टंट मास्टर शकुर पठान से शादी की. रेशमा के बेटे ताबीश पठान भी डॉक्टर हैं. वो इन दिनों नवी मुंबई में बेटे और पति के साथ रहती हैं. ZEE5 पर उनकी बायोपिक ‘द शोले गर्ल रेशमा पठान’ रिलीज हुई थी, जिसमें उनका किरदार बिदिता बाघ ने निभाया था. आगे की कहानी-खुद रेशमा की जुबानीः-

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सड़क पर करतब करते-करते चमक गई किस्मत

मुझे तो स्टंट वुमन जैसा कुछ पता ही नहीं था. घर के हालात ठीक नहीं थे, तो मैं मुंबई की सड़कों पर करतब किया करती थी. उस वक्त मैं चर्च गेट के चौक में लगे फाउंटेन के पास जाकर रस्सी पर चढ़कर लोगों को एंटरटेन करती, स्कूटर के आर-पार कूद कर जंप करती, तो वहां इक्ट्ठा लोग मुझे पैसे देते थे. ऐसे में रोजाना चार आने, अठन्नी जैसी कमाई हो जाया करती थी, जो हमारे लिए काफी होते थे. इसी बीच मुझे इंडस्ट्री से एक डायरेक्टर अजीम जिन्हें मैं अंकल कहती थी, ने स्पॉट किया. उन्होंने कहा कि तुझमें हुनर है, फिल्म इंडस्ट्री में बहुत काम मिलेंगे. उस वक्त फिल्म इंडस्ट्री हमारे लिए टैबू था. यह धारणा थी कि नाचने-गाने वाले ही इंडस्ट्री में जाते हैं. अच्छे परिवार की लड़कियां नहीं जातीं. पिताजी ने अजीम अंकल को मना कर दिया. मैंने जिद कर मां को मनाया और कहा कि एक बार जाकर देखा तो जाए.

मैं मां के साथ बुर्का पहनकर फेमस स्टूडियो गई थी. तब चौदह साल की रही होऊंगी. वहां मैं आशा पारिख की फिल्म के ऑडिशन के लिए गई थी. लेकिन वहां शूटिंग चल रही थी ‘एक खिलाड़ी बावन की’, जहां एक लड़का एक्ट्रेस लक्ष्मी छाया का डुप्लीकेट का काम कर रहा था. सीन कुछ यूं था कि कैबरे का एक सीक्वेंस है, जहां लक्ष्मी छाया को डांस करते हुए गिर जाना है. उस लड़के ने 15 टेक दिए और फिर भी उससे सीन नहीं हो पा रहा था. इसी बीच अजीम अंकल ने मेरा नाम लेते हुए कहा कि रेशमा कर लेगी. मुझे बिना बताए, गेटअप पहना दिया और सीन समझाया गया. मैं कांप रही थी लेकिन फर्स्ट टेक में ही परफेक्ट शॉट दे दिया. पूरा सेट ताली मार रहा था. बस वहीं से शुरुआत हो गई. मुझे उस एक सीन के दो सौ दस रुपये और ऑटो का किराया 75 रुपये हाथ में थमा दिए गए. इसके बाद तो फिल्मों का सिलसिला चल पड़ा. मैं फिल्म दर फिल्म के बाद स्टंट वुमन कही जाने लगी. मेरी पहली आधिकारिक फिल्म आशा पारिख की ‘राखी और हथकड़ी’ थी जिसके लिए मैं डुप्लीकेट चुनी गई थी.

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अग्रीमेंट से हुआ नुकसान फिर बन गई फ्रीलांसर

दरअसल मैं उस वक्त यूनियन मेंबर नहीं बनी थी. इसलिए मुझे पैसे हाथो-हाथ मिल गए. कुछ अंदाजा नहीं था, तो उस वक्त मुझे एक फिल्म के लिए तीन हजार रुपये दे दिए जाते थे. उस जमाने में एक फिल्म दो से ढाई साल तक चला करती थी. अग्रीमेंट साइन करने की वजह से मैं उस बीच दूसरी फिल्म भी नहीं कर सकती थी. मैंने दूसरा अग्रीमेंट ‘गरम मसाला’ फिल्म के लिए किया था. इस फिल्म में अरुणा ईरानी थीं. फिल्मों के अग्रीमेंट से मुझे बहुत नुकसान होने लगा. मैं दो-तीन साल तक तीन हजार में काम करने लगी थी. इस दौरान दूसरी जगह काम नहीं होता था. फिर मैंने रोज के हिसाब से काम करना तय किया जिसका मुझे फायदा मिला. इन दो अग्रीमेंट के बाद जब मैं फ्रीलांस के तौर पर काम करने लगी, तो कई मेंबर वालों ने आपत्ति जताई. उस वक्त स्टंट वुमन जैसी कोई कैटेगरी थी नहीं और किसी महिला ने ऐसा काम नहीं किया था, तो ऐसे में मैंने 500 रुपये देकर यूनियन का जूनियर आर्टिस्ट वाला कार्ड बनवा लिया था. मेंबर बनने के बाद मुझे तय की गई फीस के आधार पर ही पैसे मिला करते थे.

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‘शोले’ में बसंती बनी हेमा के लिए खून बहाया

आज भी फिल्म ‘शोले’ के लिए मुझे पहचाना जाता है. उस फिल्म को करने के दौरान मैं तांगा लेकर गिर पड़ी थी. दरअसल सीन यह था कि हेमा मालिनी तांगा लेकर भागती हैं और पीछे गब्बर के आदमी होते हैं. इस सीन के दौरान चोट इतनी लगी कि एक पैर में पंद्रह टांके और दूसरे पैर की स्किन निकल गई. लेकिन मैं काम छोड़ने का रिस्क नहीं ले सकती थी. मैंने जिद कर कहा कि मुझे काम तो करना है, तो रमेश सिप्पी जी ने कहा कि तुम श्योर हो…पागल तो नहीं हो गई. मैंने बोला हां, और कोई चारा नहीं है क्योंकि मेरी बहन की शादी के लिए पैसे जुगाड़ करने थे. मेरे तांगे के उस सीन के दौरान सेट पर मुझे गोद में उठाकर ले जाया गया. वहां गद्दे पर बैठी रही और तांगा रेडी होने के बाद मुझे गोद में उठाकर उसपर बिठाया गया. तांगा चलाने में कोई दिक्कत नहीं हुई हां, रोकने के दौरान मेरे पैर पर प्रेशर जरूर पड़ा. सीन को पूरा किया, हालांकि खून बहुत बहा था.

मुझे तो रोजाना जान जोखिम में डालकर अपने परिवार के लिए कमाना पड़ता था. आज इसी स्टंट वुमन की नौकरी ने मुझे पैसे, इज्जत, शोहरत दिलाई है. मैं एकमात्र ऐसी महिला थी, जो घोड़ा चलाती, गाड़ी भगाती, ऊंचाई से कूदना हो या आग से खेलना, मैं सब करती थी. अगर जान पर खतरे की सोचकर घर में बैठ जाती, तो परिवार को कैसे चला पाती. उस जमाने में तो ज्यादा सुविधाएं थी नहीं. अगर सेट पर कुछ हुआ, तो छोटा-मोटा इलाज करा देते थे. अगर कुछ हो जाता, तो परिवार भूखा ही मरता.

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जिस्म बेचना होता तो यहां नहीं, कोठे पर जाती

हालांकि मेरे लिए इंडस्ट्री में राहें कुछ आसान नहीं रहीं. इकलौती स्टंट वुमन होने की वजह से कई तरह के ताने और कमेंट्स सुनने को मिलते थे. कई समकालीन स्टंटमैन कहते थे कि हमारे ग्रुप में शामिल होजा, हमें खुश कर दे, तो तुझे और काम दिलवाएंगे. कई एक्टर लाइन मारने की कोशिश करते थे. कई प्रोड्यूसर व डायरेक्टर ने सोने के ऑफर में फिल्म में हीरोइन का रोल देने की शर्त रखी. मैंने मुंह पर कह दिया था कि जिस्म का सौदा करना हो, तो मैं कोठे पर न चली जाऊं. मैं यहां किसी का बिस्तर गर्म करने नहीं आई, मेहनत से कमाने आई हूं. हालांकि मैंने वहां हमेशा लड़कों की ही तरह व्यवहार किया. मैं लोगों को जवाब से चुप करा देती थी. इतना ही नहीं, कॉलोनी में जब लड़के लाइन मारते थे, तो उन्हें पकड़कर पीटा भी है. मुझे असीम अंकल ने पहले ही सिखा दिया था कि इस इंडस्ट्री में किसी को ऊंगली दोगी, तो वो तुम्हारा हाथ पकड़ेगा, इसलिए खुद को हमेशा मजबूत बताना और इसी सीख के साथ मैंने इतने सालों सरवाइव किया है.

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बेताब के लिए मिले थे अमृता सिंह से दोगुने पैसे

इस नौकरी ने मुझे बहुत पैसे भी दिए. ऊपर वाले का करम है कि मैंने यहां से जो भी पैसे कमाए, वो मेरे परिवार को चलाने में काम आए. भाई-बहन को सेटल किया और घर बनवाया. मैंने शादी डॉक्टर से की और परिवार में किसी को भी इंडस्ट्री में नहीं आने दिया. मैं जानती हूं कि यह इंडस्ट्री कठोर दिल वालों के लिए है और यहां हर कोई सरवाइव नहीं कर पाता है. पैसे की बात कहूं, तो मुझे कभी फीस के अंतर का सामना नहीं करना पड़ा. कई बार तो मैंने एक्ट्रेस से भी ज्यादा पैसे कमाए हैं.

मुझे याद है फिल्म ‘बेताब’ में मैंने पचास हजार कमाए थे और अमृता सिंह को पच्चीस हजार मिले थे. हालांकि अमृता की मां सुल्ताना ने मुझसे पूछा भी था कि बेटा आपका पेमेंट कितना है. मैंने बताया कि पचास हजार रुपये, तो वो हैरानी से कहने लगीं कि डुप्लीकेट होकर इतने पैसे, मेरी बेटी को तो गुडलक में 25 हजार मिले हैं. मैंने उन्हें यही समझाया कि सुल्ताना जी, आपको यह अंतर समझ में आया, लेकिन आपने ये नहीं देखा कि मैं तो स्टंट वुमन की स्टंट वुमन ही रहूंगी, अपने हाथ-पैर तुड़वाकर पैसे कमाऊंगी लेकिन आपकी बेटी स्टार बन जाएगी. ये पच्चीस हजार आपको करोड़ तक पहुंचा देंगे लेकिन मैं तो वहीं की वहीं रह जाऊंगी.

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