POLITICS

एक कप चाय

महामारी के दौरान तकरीबन दो साल तक देश का हर नागरिक घरों में बंद रहा।

हेमंत कुमार पारीक

महामारी के चलते तकरीबन दो साल तक देश का हर नागरिक घरों में बंद रहा। इसके पहले कुछ बेरोजगार नवयुवकों ने मिल कर बाजार में एक दुकान खोली थी। दुकान का नाम था ‘मिस्टर इडली’। विभिन्न प्रकार की इडलियां मिलती थीं वहां। एक अभिनव प्रयोग था। इसलिए कुछ दिनों तक वहां भीड़भाड़ दिखी। वे नवयुवक खुश थे। ग्राहकों का स्वागत बड़ी गर्मजोशी से करते दिखते थे।

मगर जैसे ही बंदी का एलान हुआ, दुकान बंद हो गई। अब सोचिए, उन बेरोजगार नवयुवकों पर क्या गुजरी होगी? हाथ का पैसा भी व्यर्थ गया। बंदी की बढ़ती पाबंदी में उनका रहा-सहा उत्साह भी ठंड़ा पड़ गया। लगभग दो वर्ष बीतने के बाद लोग घरों से बाहर निकले। मैं भी निकला। मैं उन नवयुवकों को देखना चाहता था। पर देख कर आश्चर्य हुआ कि मिस्टर इडली की जगह ‘पिज्जा हट’ का बोर्ड लगा था। वे बेरोजगार नवयुवक कहां गए, पता नहीं? इडली की जगह पिज्जा बिक रहा था।

बंदी के दौरान ऐसे कितने ही लोगों को अपनी रोजी-रोटी से हाथ धोना पड़ा। आज जब कभी मंदिर जाता हूं, तो देखता हूं कि भिखारियों की संख्या में अच्छा-खासा इजाफा हुआ है। इसी तारतम्य में कालोनी की गली के नुक्कड़ पर बहुतेरी चाय-पान, बीड़ी-सिगरेट की छोटी-छोटी दुकानें खुल रही हैं। और फुटपाथ पर सब्जी की दुकानें लगने लगी हैं। हर कोई सब्जी बेच रहा है। ऐसे-ऐसे लोग इस धंधे में आ गए हैं कि आश्चर्य होता है। दरअसल, पेट एक बड़ा सवाल है। कहते भी हैं, भूखे भजन न होई गोपाला!

कुछ समय राह चलते एक आदिवासी परिवार को सब्जी बेचते देखता था। पहले वह सड़क के किनारे अकेले दुकान लगाए दिखता था। अब उस परिवार की औरत सब्जी बेचने वालों के समूह में ठेले पर सब्जी बेचती दिखती है। उसके लेन-देन के व्यवहार को देख कर पता चलता है कि वह मजबूरी में सब्जी बेच रही है। दरअसल, बंदी में सब्जी का धंधा ही सफल रहा है। यहां तक कि सोने-चांदी की दुकानों के बाहर भी सब्जी मिल रही थी। एक दिन उससे पूछा, आप यहां की नहीं लग रही हैं? उसने अपनी भाषा में बताया कि वह छत्तीसगढ़ की है। पास ही एक झुग्गी में रहती है। शहर में उनके बहुत से भाई-बंधु काम-धंधे की तलाश में यहां आए हैं।…

दरअसल, ठेकेदार सस्ती दरों पर इन भोले-भाले मजदूरों को ले आते हैं। फिर वे उनके रहमो-करम पर जीवन यापन करते हैं। ठेकेदार को सिर्फ काम से मतलब रहता है। अगर एक बार उनके रहन-सहन को देखा जाए, तो हमें शर्म आएगी। पता चलेगा कि उनका रोजमर्रा का जीवन कितना कठिन है। वे ठंड, गर्मी और बारिश किस तरह काटते हैं, देख कर तरस आता है।

कुछ साल पहले दूर के एक रिश्तेदार के बेटे की शादी में सम्मिलित होने छत्तीसगढ़ गया था। छत्तीसगढ़ के बारे में धारणा थी कि यह प्रदेश वनस्पति और खनिज संपदा से भरापूरा है। इसे धान का कटोरा भी कहते हैं। इतना सब होने के बावजूद वहां का मूल निवासी (आदिवासी) पिछड़ा हुआ है। बंधुआ मजदूर की तरह बड़े-बड़े घरों में काम करते हैं लोग। मगर समय बदल गया है।

उस समय देख कर आश्चर्य हुआ कि मेरे उस रिश्तेदार के घर एक किशोर वय की बालिका चौबीस घंटे की नौकरी बजा रही थी। रिश्तेदार ने बताया कि परिवार विपन्न है। कमाने वाला कोई नहीं है। हमने तरस खाकर इसे रखा है। अब हमारे परिवार का एक हिस्सा है। हमने यह एक पुण्य का काम किया है। वरना अपने परिवार का पेट भरने के लिए इसे क्या कुछ नहीं करना पड़ता। उनका आशय मेरी समझ में आ रहा था।

खैर, कुछ दिन पहले मैं बाजार गया था। दीनहीन-सा एक बुजुर्ग मेरे सामने हाथ फैलाए मिन्नत कर रहा था, बाबूजी, चाय पीना है! एक चाय के पैसे दे दो!… मैं चौंका। पहले कभी भिखारी रोटी के लिए पैसे मांगा करते थे। मैंने सवालिया नजरें उसके चेहरे पर डाली, तो बोला, चाय पीने से भूख मर जाती है। कम से कम छह घंटे तक।… बाजार में ऐसे बहुत से बुजुर्ग मिलते हैं इन दिनों।

पर उसने रोटी का विकल्प चाय बता कर मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया। सच ही कहा उसने, पांच रुपए में चाय तो मिल सकती है, मगर दो रोटियां नहीं? हालांकि आज आदमी पैसों के लिए झूठ का सहारा लेता है। चाहे वह भिखारी हो या अमीर आदमी। लेकिन उस बुजुर्ग के चेहरे पर पेट की सच्चाई की झलक दिख रही थी। चिलचिलाती धूप में पसीने से लथपथ वह एक चाय के लिए पैसे मांग रहा था। कहां चुनावों के समय थाली की प्रतिस्पर्धा चलती है। पांच रुपए में एक थाली भोजन की बात करते हैं लोग।

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