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अभाव का हाशिया

सचमुच इन मासूम बच्चों के सामने हमारे समाज से लेकर हमारी सरकारों तक ने यह कैसी मजबूरी पैदा कर दी है कि इन्हें इस्तेमाल होना पड़ रहा है। इन्हें वैसे काम करने की जरूरत पड़ रही है, जो उनकी क्षमता से परे है। मुझे गुस्सा भी आ रहा था और दुख भी हो रहा था।

कुमकुम सिन्हा

सुबह चाय पीते हुए अखबार पढ़ रही थी कि कानों में ‘कूड़ा-कूड़ा’ की आवाज आई। मैं इसलिए चौंक गई कि जो आवाज मैंने सुनी थी, वह बच्चे की थी। मैं असहज हो गई यह सोच कर कि क्यों एक बच्चा घर-घर से कूड़ा इकट्ठा करने के लिए आया। यों मैं रोज कूड़े की बाल्टी लेकर दरवाजे की ओर बढ़ती हूं, लेकिन उस दिन खाली हाथ बढ़ गई, क्योंकि मैं जल्दी से दरवाजे पर जाकर देखना चाहती थी कि जिसने आवाज लगाई थी, वह सचमुच बच्चा ही था या नहीं! दरवाजे तक पहुंची थी कि एक बच्चा तेजी से सीढ़ियां चढ़ते हुए मेरे ऊपर वाले फ्लैट के दरवाजे तक पहुंच गया।

वह तुरंत उस फ्लैट का कूड़ा अपने कंधे पर लटके बड़े से थैले में डाल कर मेरी मंजिल पर आकर इधर-उधर देखने लगा कूड़े के लिए। वह आठ-नौ साल से ज्यादा का नहीं रहा होगा। मासूम चेहरा था उसका, मुस्कराता हुआ। जेहन में सालों पहले लिखी अपनी एक कविता की कुछ पंक्तियां उभर आईं- ‘फटे चीथड़ों में लिपटे और/ कंधे पर झोला लटकाए/ दुधमुंहे बच्चों की टोली/ फिर दिख गई/ ये बच्चे/ जो देश का भविष्य कहलाते हैं/ ढूंढ़ रहे हैं अपना भविष्य/ सड़कों के किनारे फैले हुए/ कूड़ा-कचरे में।’

यह बच्चा भी तो ऐसे ही बच्चों में से एक था। उसने मुझे देख कर कहा- ‘कूड़ा दे दो आंटी’। मैंने कहा- ‘क्यों दे दूं कूड़ा इतने छोटे-से बच्चे को?’ मेरी बात सुन कर बच्चे ने मुस्कुरा दिया और कहा- ‘सबने तो दिया, फिर आप क्यों नहीं?’ मैंने उसे समझाने की कोशिश की कि तुम बहुत छोटे हो और इस उम्र में तुम्हें यह काम नहीं करना है।’ उसकी स्थिति का अंदाजा लगाने के बावजूद जब मैंने उससे पढ़ाई करने के बारे में पूछा तो उसने बताया कि वह थोड़ा-थोड़ा पढ़ता है। मेरे मन में बहुत सारी बातें उमड़ने लगीं, लेकिन मैं उसका नाम पूछ कर और उससे थोड़ा प्यार से बात करने और समझाने के अलावा बहुत कुछ नहीं कर सकी।

सचमुच इन मासूम बच्चों के सामने हमारे समाज से लेकर हमारी सरकारों तक ने यह कैसी मजबूरी पैदा कर दी है कि इन्हें इस्तेमाल होना पड़ रहा है। इन्हें वैसे काम करने की जरूरत पड़ रही है, जो उनकी क्षमता से परे है। मुझे गुस्सा भी आ रहा था और दुख भी हो रहा था। मैंने उसे इस काम पर भेजने वाले व्यक्ति को बुलवाया और सवाल करने लगी कि उसने इस छोटे बच्चे को इस काम में क्यों लगाया। वह व्यक्ति नाराज हो गया।

बात यहां सिर्फ किसी एक बच्चे की नहीं है, बल्कि उस जैसे हजारों बच्चों की है जो किसी न किसी तरह से शोषण के शिकार हैं। पढ़ाई की उम्र में जोखिम भरे काम करने को मजबूर हैं।

सड़कों पर आते-जाते चौक-चौराहों पर अमूमन हम सबने देखा होगा ऐसे नन्हे-मुन्ने बच्चों को जो कभी हमारी गाड़ी के पास आकर पैसे मांगने लगते हैं, तो कभी अपने नन्हे कोमल हाथों में थामे रोजमर्रा के इस्तेमाल में आने वाली चीजें खरीदने के लिए लोगों से विनती करने लगते हैं। हममें से ज्यादातर लोग उनकी तरफ ठीक से देखते तक नहीं हैं या यों कहें कि उनसे हम अपनी आंखें फेर लेते हैं, क्योंकि हमें ऐसे दृश्य सामान्य लगते हैं। काश! हम इसे एक फिक्र के लायक समस्या के रूप में देख पाते। सोच पाते कि आखिर किन वजहों से इन बच्चों के सामने ऐसे हालात पैदा हो गए कि खेलने-कूदने और स्कूल जाने की उम्र में ये बच्चे अपना और अपने परिवार का पेट पालने के काम पर लगा दिए जाते हैं। बच्चों के शोषण की जगहें और भी हैं, जैसे ढाबे, कारखाने आदि।

कई घरों में भी काम करने के लिए छोटे बच्चे रखे जाते हैं और उनसे उनकी क्षमता से ज्यादा काम करवाया जाता है। यही नहीं उनके साथ कई बार घर के लोगों का बर्ताव भी बहुत बुरा होता है। न भरपेट खाना दिया जाता है, न ढंग का कपड़ा।

दरअसल, बाल मजदूरी समाज और देश के ऊपर एक बहुत बड़ा धब्बा है। बच्चों से उनका बचपन छीन कर उन्हें जोखिम वाले कामों में लगा देना एक गंभीर जुर्म है और इसमें सरकार और उन बच्चों के माता-पिता से लेकर समाज के सभी वर्गों के लोगों का हाथ है। जिस उम्र में उस कूड़ा उठाने वाले बच्चे की तरह के तमाम बच्चों को स्कूल में होना चाहिए, उस उम्र में वे ढाबों, कारखानों, सड़कों जैसी जगहों पर मिलते हैं।

किसी सभ्य समाज में सामूहिक रूप से बाल मजदूरी के खिलाफ आवाज उठनी चाहिए। जहां तक हो सके, ऐसे बच्चों को शिक्षा की ओर उन्मुख करना चाहिए, इसकी व्यवस्था करवानी चाहिए, क्योंकि यही एक ऐसा उपाय है जो उन्हें न केवल सपने देखना सिखाएगा, बल्कि उन सपनों को पूरा करने के लिए उनमें हौसला भी भरेगा। क्या ऐसा नहीं हो सकता है कि हम अपना सामाजिक और नैतिक कर्तव्य निभाते हुए इन बच्चों के लिए कुछ करें, ताकि वे अपने बचपन में लौट सकें, पढ़ें-लिखें और बेहतर जीवन जी सकें।

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